सामान्य विज्ञान: मानव परिसंचरण तंत्र

मानव परिसंचरण तंत्र

रक्त, तरल संयोजी ऊतक (Fluid Connective Tissue) है। 

हीमेटोलॉजी – रक्त का अध्ययन (Harnatology) करने वाली विज्ञान की शाखा।

हीमोपोएसिस – शरीर में रक्त निर्माण की प्रक्रिया (रक्त कणिकाओं)

स्वस्थ व्यक्ति में सामान्यत: रक्त 5-6 लीटर होता है।

महिलाओं में पुरुषों की तुलना में \(\frac{1}{2}\) लीटर रक्त कम होता है क्योंकि महिलाओं में RBC की संख्या कम होती है।

शरीर के वजन का लगभग 7-8 % रक्त होता है।

मानव रक्त का pH लगभग 7.4 (हल्का क्षारीय) होता है।

रक्त के घटक :-

1. रक्त प्लाज़्मा (Blood Plasma)– 55%

2. रक्त कणिकाएँ (Blood Corpuscles)– 45%

1. रुधिर प्लाज़्मा (Blood Plasma) :-

रुधिर प्लाज्मा, रक्त का लगभग 55% भाग होता है।

यह हल्का पीले रंग का होता है।

प्लाज्मा में सर्वाधिक मात्रा में पानी होता है। (55% का 90 से 92% पानी) अर्थात् रुधिर प्लाज्मा, रक्त का तरल भाग होता है।

रुधिर प्लाज्मा में 7 से 8% प्रोटीन पाए जाते हैं। रुधिर प्लाज्मा में मुख्यत: फाइब्रिनोजन, एल्ब्यूमीन तथा ग्लोब्यूलीन प्रोटीन पाए जाते हैं।

इन प्रोटीन का निर्माण यकृत (Liver) में होता है।

प्लाज्मा के गाढ़ेपन का कारण प्रोटीन होता है।

फाइब्रिनोजन प्रोटीन, रक्त का थक्का बनाने में सहायक है।

एल्ब्यूमीन प्रोटीन, शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में सहायक है।

प्लाज़्मा के प्रमुख कार्य –

  • रक्त का थक्का बनाने में सहायक।
  • शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में सहायक।
  • गैसों का परिवहन करने में सहायक।

रुधिर प्लाज़्मा में से फाइब्रिनोजन प्रोटीन को निकालने के पश्चात् शेष प्लाज़्मा, सीरम कहलाता है।

(सीरम = रुधिर प्लाज्मा – फाइब्रिनोजन प्रोटीन)

2. रुधिर कणिकाएँ (Blood Corpuscles) :- 

रुधिर कणिकाएँ, कुल रक्त का 45% भाग होती है।

रुधिर कणिकाएँ तीन प्रकार की होती है–

(i)  RBC (लाल रक्त कणिकाएँ)

(ii)  WBC (श्वेत रक्त कणिकाएँ)

(iii)  Platelet (बिम्बाणु) 

(i) RBC – लाल रक्त कणिकाएँ/इरिथ्रोसाइट्स  :-

स्तनधारियों की RBC में केन्द्रक अनुपस्थित होता है। 

स्तनधारियों में केन्द्रक युक्त RBC केवल ऊँट तथा लामा में पाई जाती है।

RBC/लाल रक्त कणिकाएँ/इरिथ्रोसाइट्स का जीवनकाल लगभग 120 दिन होता है।

प्लीहा/तिल्ली को ‘RBC का कब्रिस्तान’ कहा जाता है।

RBC में हीमोग्लोबिन पाया जाता है जिसका रंग बैंगनी होता है।

प्लीहा/तिल्ली को ‘शरीर का रुधिर बैंक’ भी कहते हैं।

भ्रूण में RBC का निर्माण यकृत व प्लीहा में होता है।

वयस्क में RBC का निर्माण लाल अस्थिमज्जा (Red Bone Marrow) में होता है।

हीमोग्लोबिन एक श्वसन वर्णक है अर्थात् यह गैसों का आदान-प्रदान करता है।

हीमोग्लोबिन का प्रमुख कार्य O2 का परिवहन करना है।

हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन (O2) से जुड़कर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है तथा ऑक्सीहीमोग्लोबिन के कारण रक्त का रंग लाल होता है।

हीमोग्लोबिन में लौह धातु (4%) एवं प्रोटीन (96%) पाया जाता है। 

मनुष्य में RBC की संख्या – 

नर – 55 लाख/mm3

मादा – 45 लाख/mm3

मनुष्य में हीमोग्लोबिन की मात्रा –

नर – 14-16 ग्राम/100 ml

मादा – 12-14 ग्राम/100 ml

रक्त/RBC/हीमोग्लोबिन/लोहे की कमी से एनीमिया (रक्ताल्पता /रक्तक्षीणता/अरक्तता) हो जाता है।

RBC के परिपक्वन हेतु थाइरॉक्सिन हॉर्मोन आवश्यक होता है।

RBC के विकास हेतु Vitamin-B6 तथा Vitamin-B12 आवश्यक होते हैं।

विटामिन-B6 का रासायनिक नाम पाइरीडॉक्सीन है।

विटामिन-B12 का रासायनिक नाम सायनोकोबालामीन है।

विटामिन-B12 में कोबाल्ट पाया जाता है।

रक्त-कणिकाओं का लगभग 99 % भाग RBC होता है।

Note :

मलेरिया रोग में RBC की संख्या कम हो जाती है।

मलेरिया प्रोटोजोआ जनित रोग है।

पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले रोगों में RBC की संख्या सामान्य लोगों से अधिक होती है।

सोते समय RBC की संख्या में लगभग 5 प्रतिशत की कमी आ जाती है।

RBC की अधिकता से पॉलिसायथेमिया हो जाता है।

हीमोसाइटोमीटर की सहायता से RBC की गणना की जाती है।

मनुष्य की RBC में केन्द्रक नहीं होने के कारण RBC उभयावतल-Biconcave/चपटी होती है।

सबसे बड़ी RBC एम्फीयुमा की होती है।

सबसे छोटी RBC कस्तूरी मृग की होती है।

RBC तथा WBC का अनुपात 600:1 होता है।

(ii) WBC– श्वेत रक्त कणिकाएँ/ल्यूकोसाइट्स :-

WBC में हीमोग्लोबिन नहीं होता है।

WBC में केन्द्रक उपस्थित होता है।

WBC का निर्माण अस्थिमज्जा एवं लसिका ग्रंथियों में होता है।

WBC का कार्य शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखना है।

WBC को शरीर का सैनिक कहा जाता है।

ल्यूकोपीनिया में WBC की संख्या कम हो जाती है; जैसे – एड्स में

ल्यूकोसाइटोसिस में WBC की संख्या बढ़ जाती है; जैसे – कैंसर

WBC के परिपक्वन हेतु थायमोसीन हॉर्मोन आवश्यक होता है।

WBC की संख्या 6000-9000/mm3 या 6000-11000/mm3 होती है।

WBC का जीवनकाल लगभग एक सप्ताह (2-7 दिन) होता है।

Note : 

लिम्फोसाइट्स का जीवनकाल लगभग 10 वर्ष या अधिक होता है।

थायमस ग्रंथि से बनने वाला थायमोसीन हॉर्मोन लिम्फोसाइट्स के परिपक्वन में सहायक है।

लिम्फोसाइट्स सबसे छोटी WBC है जो कुल WBC का लगभग 20-25% भाग होती है।

मोनोसाइट्स सबसे बड़ी WBC है, जो कुल WBC का लगभग 5-10% होती है।

अकणिकामय WBC का प्रमुख कार्य एंटीबॉडी का निर्माण करना है।

(iii) बिंबाणु/प्लेटलेट्स/थ्रोम्बोसाइट्स :-

बिंबाणु में केंद्रक अनुपस्थित होता है तथा यह केवल स्तनधारियों के रक्त में पाए जाते हैं।

बिंबाणु का निर्माण अस्थिमज्जा (Bone Marrow) में होता है।

बिंबाणु का कार्य रक्त का थक्का बनाने में सहायता करना है।

थ्रोम्बोपोएसिस – बिंबाणुओं के निर्माण की प्रक्रिया।

प्लेटलेट्स का जीवनकाल लगभग 1 से 10 दिन या लगभग 1 सप्ताह होता है।

प्लेटलेट्स की संख्या लगभग 1.5 से 3 लाख होती है।

'डेंगू' में बिंबाणुओं (Platelets) की संख्या कम हो जाती है। इसलिए डेंगू रोगी को रक्त चढ़ाते समय केवल बिंबाणु चढ़ाए जाते हैं।

मनुष्य में बिंबाणुओं (Platelets) का सामान्य से कम हो जाना 'थ्रोम्बोसाइटोपीनिया' कहलाता है।

मनुष्य में बिंबाणुओं (Platelets) का सामान्य से अधिक हो जाना 'थ्रोम्बोसाइटोसिस' कहलाता है।

रक्त समूह (Blood Group) :-

रक्त समूह A, B, O की खोज कॉर्ल-लैण्डस्टीनर ने की।

कॉर्ल-लैण्डस्टीनर को वर्ष 1930 में इस खोज के लिए चिकित्सा क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार मिला।

डी-कॉस्टेलो एवं स्टर्ली ने रक्त समूह AB की खोज की।

रक्त समूह (Blood group) का विभाजन प्रतिजन (एंटीजन) के आधार पर होता है।

एंटीजन (प्रतिजन) RBC की सतह पर पाए जाने वाले विशेष प्रकार के प्रोटीन होते हैं।

रक्त समूह

एंटीजन 

(RBC)

एंटीबॉडी

(प्लाज्मा)

A

A

b

B

B

a

सर्वग्राही AB+

AB

अनुपस्थित

सर्वदाता O

अनुपस्थित

ab

रक्त का आदान-प्रदान/रक्ताधान (Blood Transfusion) :-

विश्व में सर्वप्रथम रक्त का आदान-प्रदान 15 जून, 1667 को डॉ. जीन डेविस द्वारा फ्रांस में किया गया।

14 जून को विश्व रक्तदान दिवस (World Blood Donor Day) मनाया जाता है।

भेड़ से रक्त 15 वर्षीय बालक में सफलता-पूर्वक चढ़ाया गया।

Rh कारक (Factor) :-

Rh कारक (Factor) की खोज वर्ष 1940 में कॉर्ल लैण्डस्टीनर एवं वीनर ने की।

इन्होंने 'रीसस (Rhesus) मकाका बंदर' (लाल मुँह के बंदर) में Rh कारक की खोज की।

जिस व्यक्ति के रक्त में Rh कारक पाया जाता है, उसे Rh+ कहते हैं जबकि जिसमें Rh कारक अनुपस्थित होता है, उसे Rh कहते हैं।

पुरुष (Rh+), महिला (Rh) की आपस में शादी करने पर पहली संतान सामान्य जन्म लेगी एवं बाकी सभी संतानें मृत पैदा होगी।

इस रोग को 'इरिथ्रो ब्लास्टोसिस फीटेलिस' कहते हैं।

इस रोग के उपचार हेतु प्रथम प्रसव के 24 घंटों के भीतर Anti Rh.D (Ig. G) का इंजेक्शन लगाया जाता है। (Ig-इम्यूनोग्लोबिन-G)

भारत में लगभग 96 प्रतिशत Rh+ हैं, जबकि विश्व में लगभग 85 प्रतिशत लोग Rh+ हैं।

रक्त दाब/रक्त चाप/B.P. :-

हृदय द्वारा रक्त को पम्प करते समय रुधिर-वाहिनियों पर लगाया गया दाब, रक्तदाब (B.P.) कहलाता है।

एक स्वस्थ व्यक्ति का रक्तदाब 120/80 mm Hg होता है।

सर्वप्रथम रक्तदाब 1773 ई. में 'हेल्स' द्वारा घोड़े में मापा गया। 

रक्तदाब के दो प्रकार –

(i) सिस्टोलिक रक्तदाब (Systolic Blood Pressure) :-

हृदय द्वारा सिकुड़ी हुई अवस्था में लगाया गया दाब 'सिस्टोलिक रक्तदाब' कहलाता है।

सिस्टोलिक रक्तदाब का मान 120 mm Hg होता है, जो रक्तदाब की उच्च सीमा होती है।

(ii) डाएस्टोलिक रक्तदाब (Diastolic Blood Pressure)

हृदय द्वारा फैली हुई अवस्था में लगाया गया दाब 'डाएस्टोलिक रक्तदाब' कहलाता है।

डाएस्टोलिक रक्तदाब का मान 80 mm Hg होता है, जो रक्त-दाब की निम्न सीमा होती है।

रक्तदाब 'स्फिग्नोमैनोमीटर' से मापा जाता है।

स्फिग्नोमैनोमीटर में पारा (Hg) भरा होता है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य –

रक्त में हिपेरीन नामक प्रतिस्कंदनकारी (Anti-Coagulants) पाया जाता है, जो शरीर में रक्त को जमने से रोकता है।

चोट लगने पर हिपेरीन बाहरी हवा के संपर्क में आने पर वाष्पीकृत हो जाता है तथा रक्त का थक्का बन जाता है।

हीपेरीन का निर्माण यकृत (Liver) में होता है।

शरीर में रक्त का शुद्धीकरण वृक्क/गुर्दे/Kidney में होता है।

हृदय का कार्य रक्त को पम्प करना है।

मनुष्य के हृदय का वजन लगभग 300 ग्राम होता है।

महिलाओं के हृदय का वजन पुरुषों के हृदय के वजन की तुलना में लगभग 50 ग्राम कम होता है।

एंजियोग्राफी – धमनियों में आई रुकावट की जाँच करना।

एंजियोप्लास्टी – धमनियों में आई रुकावट को दूर करना।

ECG (इलेक्ट्रो कॉर्डियो ग्राफ) – हृदय की जाँच है।

EEG (इलेक्ट्रो ऐनसेफेलो ग्राफ) – मस्तिष्क की जाँच है।

1 यूनिट रक्त – 350 ml (WHO के अनुसार)

रुधिर बैंक में रुधिर को लगभग 4.4oC तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है।

रुधिर बैंक में रुधिर को सुरक्षित रखने हेतु उसमें सोडियम सीट्रेट मिलाया जाता है।

कृत्रिम हृदय को ‘जॉर्विक-7’ नाम दिया गया।

स्वस्थ मनुष्य की हृदय दर 72/मिनट होती है।

सर्वाधिक हृदय दर (600-800/मिनट) छछुंदर में होती है।

न्यूनतम हृदय दर (20-25/मिनट) व्हेल मछली में होती है।

ब्रेडीकॉर्डिया – हृदय दर का सामान्य कम होना।

टेकीकॉर्डिया – हृदय दर का सामान्य से अधिक होना।

विश्व हृदय दिवस 29 सितम्बर को मनाया जाता है।

शरीर के किसी भाग में जब रक्त-प्रवाह कम होता है, तो इसे ‘इस्कीमिया’ कहा जाता है।

हाइपरऐरेमिया में रक्त प्रवाह बढ़ जाता है।

ब्रेकियल धमनी – B.P. 

रेडियल धमनी – Pulse Rate (हृदय दर)

रक्त परिसंचरण तंत्र (Blood Circulatory System) :-

डॉ. विलियम हॉर्वे ने विस्तृत रूप से मानव परिसंचरण तंत्र के बारे में बताया।

मानव परिसंचरण तंत्र के भाग :-

(i) मानव हृदय (Human Heart)

(ii) रक्त (Blood)                

(iii) रक्त नलिकाएँ (Blood Vessels)

(iv) लसिका तंत्र (Lymphatic System)

मनुष्य में बंद, दोहरा एवं विकसित रक्त परिसंचरण पाया जाता है।

मानव हृदय में 4 कोष्ठ (chambers) होते हैं (2 आलिंद- Atrium, 2 निलय- Ventricle) 

धमनी (Artery)

शिरा (Vein)

1.धमनी हृदय से शरीर के विभिन्न अंगों की ओर रक्त ले जाती है।

1.शिरा, शरीर के विभिन्न अंगों से हृदय की ओर रक्त ले जाती है।

2.धमनियाँ गहराई में पाई जाती है।

2.शिराएँ सतह पर पाई जाती है।

3.धमनी की गुहा सँकरी होती है।

3.शिरा की गुहा अपेक्षाकृत चौड़ी होती है।

4.धमनियों में अधिक दाब से रक्त बहता है।

4.शिराओं में अपेक्षाकृत कम-दाब से रक्त बहता है।

5.धमनियों में ऑक्सीकृत (शुद्ध) रक्त बहता है।

अपवाद –फुफ्फुसीय धमनी 

5.शिराओं में डीऑक्सीकृत (अशुद्ध) रक्त बहता है।

अपवाद – फुफ्फुसीय शिरा

6.धमनियों की दीवारें अपेक्षाकृत मोटी होती है।

6.शिराओं की दीवारें अपेक्षाकृत पतली होती है।

7.धमनियों में वॉल्व (कपाट) नहीं पाए जाते हैं।

7.शिराओं में वॉल्व (कपाट) पाए जाते हैं।

Note : 

वॉल्व (कपाट) रक्त के विपरीत प्रवाह को रोकते हैं।

एंजियोलॉजी – रक्त परिसंचरण तंत्र का अध्ययन।

कॉर्डियोलॉजी – हृदय का अध्ययन।

हृदय के चारों ओर पाया जाने वाला आवरण, हृदयावरण (पेरीकॉर्डियम) कहलाता है।

हृदय के चारों ओर पेरीकॉर्डियल द्रव भरा रहता है, जो हृदय की बाहरी आघातों से सुरक्षा करता है।

हृदय मांसपेशियों से बनी संरचना है, जिसका आकार बंद मुट्ठी के समान/शंक्वाकार होता है।

हृदयावरण के तीन स्तर होते हैं-

(i) एपीकॉर्डियम – यह सबसे बाहरी स्तर होता है।

(ii) मायोकॉर्डियम – यह मध्य स्तर होता है।

(iii) एण्डोकॉर्डियम – यह सबसे भीतरी स्तर होता है, जो रक्त को हृदय से चिपकने से रोकता है।

हृदय पर नियंत्रण मेडूला-ऑब्लोगेटा में उपस्थित ‘कॉर्डियक-सेन्टर’ द्वारा किया जाता है।

हृदय प्रतिस्पंदन लगभग 70ml रक्त को पम्प करता है अर्थात् हृदय 1 मिनट में लगभग 4-5 लीटर रक्त को पम्प कर सकता है। इसलिए हृदय शरीर का सबसे व्यस्त अंग माना गया है।

दाएँ आलिंद एवं दाएँ निलय के मध्य त्रिवलनी कपाट पाया जाता है।

बाएँ आलिंद एवं बाएँ निलय के मध्य द्विवलनी कपाट पाया जाता है।

द्विवलनी – वॉल्व को मिट्रल वॉल्व भी कहा जाता है।

शरीर के विभिन्न भागों से रक्त सर्वप्रथम दाएँ आलिंद में लाया जाता है।

Atrium (heart) - Wikipedia

शरीर के निचले हिस्सों से पश्च महाशिरा द्वारा रक्त दाएँ आलिंद में लाया जाता है, जो शरीर की सबसे बड़ी शिरा है।

अग्र महाशिरा द्वारा शरीर के विभिन्न ऊपरी भागों से हृदय के दाएँ आलिंद में रक्त लाया जाता है।

कोरोनरी साइनस हृदय या हृदय के आस-पास से दाएँ आलिंद (R.A.) में रक्त पहुँचाती है।

दाएँ आलिंद से त्रिवलनी वॉल्व के माध्यम से रक्त दाएँ निलय में पहुँचता है।

दाएँ-निलय से फुफ्फुसीय धमनी (Pulmonary Artery) द्वारा रक्त फेफड़ों में पहुँचता है।

फेफड़ों में गैसों का आदान-प्रदान (गैस-विनिमय) होता है।

फेफड़ों से ऑक्सीकृत रक्त, फुफ्फुसीय शिरा द्वारा बाएँ आलिंद (L.A.) में लाया जाता है।

बाएँ आलिंद एवं बाएँ निलय (L.V.) के मध्य द्विवलनी वॉल्व/मिट्रल वॉल्व होता है। इसके माध्यम से रक्त बाएँ आलिंद से बाएँ निलय में पहुँचता है।

बाएँ निलय से महाधमनी द्वारा ऑक्सीकृत रक्त शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचता है।

महाधमनी सबसे बड़ी धमनी है।

बायाँ निलय हृदय का सर्वाधिक कार्य करने वाला कक्ष होता है।

निलय में संकुचन से त्रिवलनी वॉल्व तथा द्विवलनी वॉल्व के बंद होने से ‘LUBB’ की ध्वनि सुनाई देती है। यह ‘हृदय की प्रथम’ ध्वनि होती है जो सामान्यत: 0.15 सेकण्ड तक सुनाई देती है तथा अपेक्षाकृत मंद होती है।

अर्द्धचन्द्राकार वॉल्व (पल्मोनरी वॉल्व तथा एऑर्टिक वॉल्व) के बंद होने से हृदय की द्वितीय ध्वनि सुनाई देती है, जिसे DUBB कहते हैं।

यह ध्वनि लगभग 0.1 सेकण्ड तक सुनाई देती है तथा अपेक्षाकृत तीव्र होती है।

हृदय के बाएँ भाग में ऑक्सीकृत रक्त पाया जाता है, जबकि दाएँ भाग में डी-ऑक्सीकृत रक्त होता है।

दाएँ आलिंद के ऊपरी भाग में घुण्डीनुमा संरचना होती है, जिसे S.A. Node कहा जाता है।

S.A. Node को पेसमेकर तथा ‘हृदय का हृदय’ भी कहा जाता है।

कृत्रिम पेसमेकर की बैटरी ‘लीथियम’ धातु की बनी होती है।  

S.A. Node (पेसमेकर), मेडूला-ओब्लोगेटा के कॉर्डियक सेन्टर से निर्देश प्राप्त करता है।

A.V. Node को पेसमेकर भी कहा जाता है, जो हृदय की लयबद्धता को बनाए रखता है, जो S.A. Node से निर्देश प्राप्त करता है।

सूक्ष्म संरचनाएँ जो A.V. Node से निर्देश प्राप्त करती है, ‘हिज के बंडल’ कहलाती है।

अति सूक्ष्म संरचनाएँ जो निलय की दीवारों में प्रवेश करती है, ‘पुरकिंजे तंतु’ कहलाती है।

अग्र महाशिरा (SVC) में हेवर्शियन वॉल्व, पश्च महाशिरा (IVC) में यूस्टेकियन वॉल्व तथा कोरोनरी साइनस में कोरोनरी वॉल्व पाया जाता है।

फुफ्फुसीय धमनी तथा महाधमनी के उत्पत्ति स्थल पर अर्द्धचन्द्राकार वॉल्व पाए जाते हैं।

हृदय की मांसपेशियों को स्वस्थ बनाए रखने हेतु कैल्सियम, सोडियम, पोटैशियम आवश्यक होते हैं।

हृदय में रक्त प्रवाह के विकार का पता ‘थैलीयम-201’ नामक समस्थानिक की सहायता से लगाया जाता है।

विश्व में सर्वप्रथम हृदय का प्रत्यारोपण 3 दिसम्बर, 1967 को केपटाउन हॉस्पीटल (दक्षिण अफ्रीका) में डॉ. क्रिश्चियन बर्नार्ड द्वारा किया गया।

भारत में सर्वप्रथम हृदय का प्रत्यारोपण 3 अगस्त, 1994 को डॉ. वेणुगोपाल द्वारा एम्स, नई दिल्ली में किया गया।

Note :

मछली के हृदय के दो भाग होते हैं।

(एक आलिंद, एक निलय)

उभयचर (जल, स्थल) के हृदय के तीन भाग होते हैं।

(दो आलिंद, एक निलय)

सरीसृप के हृदय के तीन भाग होते हैं।

(दो आलिंद, एक निलय)

मगरमच्छ, पक्षी, स्तनधारी आदि के हृदय में दो आलिंद व दो निलय होते हैं।

एंजाइमा – हृदय की पेशियों में O2 की कमी हो जाने से सीने में दर्द होने लगता है।

कोरोनरी धमनी में रुकावट आने से हृदयाघात हो सकता है।

रक्त का थक्का बनना :-

चोट लगने पर कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने से रक्त बहने लगता है।

इस दौरान प्लेटलेट्स (बिंबाणु) के टूटने से थ्रोम्बोप्लास्टिन नामक पदार्थ बनता है।

चोट+क्षतिग्रस्त प्लेटलेट्स à थ्रोम्बोप्लास्टिन

प्रोथ्रॉम्बिन, थ्रोम्बोप्लास्टिन एवं कैल्सियम की उपस्थिति में थ्रॉम्बिन में बदल जाता है।

थ्रॉम्बिन, रुधिर प्लाज्मा में पाए जाने वाले फाइब्रिनोजन प्रोटीन को फाइब्रिन में बदल देता है।

फाइब्रिन अघुलनशील तंतुओं का जाल होता है, जिसमें RBC आदि फँस जाते हैं एवं रक्त का थक्का बन जाता है।

फाइब्रिन + RBC àरक्त का थक्का बनना

लसिका (Lymph) :-

यह रंगहीन द्रव है, जिसमें CO2 की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है।

इसमें केवल WBC उपस्थित होती है।

इसमें पोषक पदार्थ अपेक्षाकृत कम होते हैं।

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